लखनऊ। कैनवस पर अपनी अभिव्यक्ति उकेरने वाले कालाकार राजीव मिश्र ने रंग और तूलिका से काफी प्रयोग किये। बॉल पेन से कृतियों की श्रंखला अभी बंद ही नहीं हुई थी कि राजीव ने मूर्ती कला में भी नया प्रयोग कर कलाकारों के बीच एक नई बहस छेड दी है। हालांकि राजीव मिश्र के कला प्रेमियों की लम्बी फेहरिस्त है। राजीव को कला के प्रति सर्मपण और योगदान के लिए आने वाले दिनों में ब्राह्मण समाज सम्मानित करेगा।
Tuesday, October 20, 2009
Friday, October 16, 2009
प्रेम और ज़िन्दगी
फूस की छत,पूस की रात
थोडे से अंगारे,कंबल का साथ
हाथ में तेरे हाथ
क्या बात-क्या बात
प्रेम गूंजता है,
कदम सडकों पर रह जायें लोटते
ख्वाब देखते आंख अधूरे
रोकते हर ख्वाब को और लौटा देते
नहीं अभी नहीं
नहीं अभी नहीं
ज़िन्दगी कसमसाती है।
[कविता पर महेश की उकेरी गई कृति]
जिन्दगी एक जश्न है

जिन्दगी एक जश्न है
हर मोडपर टूटते ख्वाब
बिखरते,ख्यालात
परेशानियां उलझने
इस सबको समेटे हुए
जिन्दगी एक जश्न है
थोडी सी खुशी और
दर्द के अंबार
ठोकर खा खा कर उठता रहा इंसान
जूझता,झिझोडता फिर भी
जिन्दगी एक जश्न है
एक दौड,एक प्यास
जीवन के प्रारम्भ से
जीवन के अन्त तक
थक कर बैठ जाये फिर भी
जिन्दगी एक जश्न है।
[चित्रकार महेश गुप्ता का रेखाचित्र]
Wednesday, October 14, 2009
मेरी चादर
मेरी चादर है छोटी क्यों
या मेरे पांव लम्बे हो गये हैं
छांव की पहर है लम्बी क्यों
या धूप के साये लम्बे हो गये हैं
सच की उम्र है छोटी क्यों
या झूठ ज्यादा रसीले हो गये हैं
अमन की दस्तक है छोटी क्यों
या दगें हंसी फलसफे हो गये हैं
जिन्दगी की चाह हे छोटी क्यों
या बसंत के फूल शुष्क हो गये हैं
वर्षा में है प्यास क्यों
या घन प्यासे बरस रहे हैं।
[ कलाकार महेश द्वारा कविता पर उकेरी गई कलाकृति ]
जिन्दगी
जिन्दगी
गुलमोहर,पलाश अमलताश
हरसिंगार,अशोक के फूल
जिन्दगी
किसी शायर के नगमों की तरह
कितनी महकती मशगूल
बबूल,कैक्टस नागफनी,
सूखे वृक्ष,उडती धूल
जिन्दगी
किसी मजदूर की पसलियों की तरह
कितनी मजबूर।
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जिस कलम से यह कवितालिखी गई है,वह मेरे पास नहीं है पर कविता
में रंग भरने के लिए कलाकार महेश द्वारा उकेरी गई रेखाएं
जिन्दगी को बेहद करीब से देखती हैं
निश्चित तौर पर लेखिका और कलाकार की यह बेहतरीन तुकबंदी है।
Wednesday, September 23, 2009
उत्सवों के बीच प्रेम,उल्लास,खुशी को खोजें
काफी सहज और साफगोई से अपनी बात रखने वाले मेरे अभिन्न मित्र महेश गुप्ता से मुलाकात हुए तो अरसा हो गया लेकिन जब भी मै उनकी कृतिया देखता हूं तो मुझे लगता है कि जल्द ही किसी मोड पर हम जरुर मिलेगें। विचार,संवेदना,अभिव्यक्ति से लबरेज महेश की कृतियों का प्रयोग करने का मौका मुझे असल में सात वर्षो के बाद मिला। सात वर्ष बाद ही सही मैं बेहद ही उत्साहित हूं कि मेरे नये ब्लाग की शुरूआत महेश की कृतियों से ही हो रही है।
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