फूस की छत,पूस की रात
थोडे से अंगारे,कंबल का साथ
हाथ में तेरे हाथ
क्या बात-क्या बात
प्रेम गूंजता है,
कदम सडकों पर रह जायें लोटते
ख्वाब देखते आंख अधूरे
रोकते हर ख्वाब को और लौटा देते
नहीं अभी नहीं
नहीं अभी नहीं
ज़िन्दगी कसमसाती है।
[कविता पर महेश की उकेरी गई कृति]

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