Wednesday, October 14, 2009

मेरी चादर






मेरी चादर है छोटी क्यों
या मेरे पांव लम्बे हो गये हैं


छांव की पहर है लम्बी क्यों
या धूप के साये लम्बे हो गये हैं


सच की उम्र है छोटी क्यों
या झूठ ज्यादा रसीले हो गये हैं


अमन की दस्तक है छोटी क्यों
या दगें हंसी फलसफे हो गये हैं


जिन्दगी की चाह हे छोटी क्यों
या बसंत के फूल शुष्क हो गये हैं


वर्षा में है प्यास क्यों
या घन प्यासे बरस रहे हैं।

[ कलाकार महेश द्वारा कविता पर उकेरी गई कलाकृति ]

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