Friday, October 16, 2009

प्रेम और ज़िन्दगी


फूस की छत,पूस की रात
थोडे से अंगारे,कंबल का साथ
हाथ में तेरे हाथ
क्या बात-क्या बात
प्रेम गूंजता है,
कदम सडकों पर रह जायें लोटते
ख्वाब देखते आंख अधूरे
रोकते हर ख्वाब को और लौटा देते
नहीं अभी नहीं
नहीं अभी नहीं
ज़िन्दगी कसमसाती है।


[कविता पर महेश की उकेरी गई कृति]

जिन्दगी एक जश्न है






जिन्दगी एक जश्न है
हर मोडपर टूटते ख्वाब
बिखरते,ख्यालात
परेशानियां उलझने
इस सबको समेटे हुए
जिन्दगी एक जश्न है
थोडी सी खुशी और
दर्द के अंबार
ठोकर खा खा कर उठता रहा इंसान
जूझता,झिझोडता फिर भी
जिन्दगी एक जश्न है
एक दौड,एक प्यास
जीवन के प्रारम्भ से
जीवन के अन्त तक
थक कर बैठ जाये फिर भी
जिन्दगी एक जश्न है।
[चित्रकार महेश गुप्ता का रेखाचित्र]
Attention! This is not a healthy practice.