मेरी चादर है छोटी क्यों
या मेरे पांव लम्बे हो गये हैं
छांव की पहर है लम्बी क्यों
या धूप के साये लम्बे हो गये हैं
सच की उम्र है छोटी क्यों
या झूठ ज्यादा रसीले हो गये हैं
अमन की दस्तक है छोटी क्यों
या दगें हंसी फलसफे हो गये हैं
जिन्दगी की चाह हे छोटी क्यों
या बसंत के फूल शुष्क हो गये हैं
वर्षा में है प्यास क्यों
या घन प्यासे बरस रहे हैं।
[ कलाकार महेश द्वारा कविता पर उकेरी गई कलाकृति ]
