Wednesday, October 14, 2009

मेरी चादर






मेरी चादर है छोटी क्यों
या मेरे पांव लम्बे हो गये हैं


छांव की पहर है लम्बी क्यों
या धूप के साये लम्बे हो गये हैं


सच की उम्र है छोटी क्यों
या झूठ ज्यादा रसीले हो गये हैं


अमन की दस्तक है छोटी क्यों
या दगें हंसी फलसफे हो गये हैं


जिन्दगी की चाह हे छोटी क्यों
या बसंत के फूल शुष्क हो गये हैं


वर्षा में है प्यास क्यों
या घन प्यासे बरस रहे हैं।

[ कलाकार महेश द्वारा कविता पर उकेरी गई कलाकृति ]

जिन्दगी



जिन्दगी
गुलमोहर,पलाश अमलताश
हरसिंगार,अशोक के फूल
जिन्दगी
किसी शायर के नगमों की तरह
कितनी महकती मशगूल
बबूल,कैक्टस नागफनी,
सूखे वृक्ष,उडती धूल
जिन्दगी
किसी मजदूर की पसलियों की तरह
कितनी मजबूर।
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जिस कलम से यह कविता
लिखी गई है,वह मेरे पास नहीं है पर कविता
में रंग भरने के लिए कलाकार महेश द्वारा उकेरी गई रेखाएं
जिन्दगी को बेहद करीब से देखती हैं
निश्चित तौर पर लेखिका और कलाकार की यह बेहतरीन तुकबंदी है।
Attention! This is not a healthy practice.