Wednesday, October 14, 2009

मेरी चादर






मेरी चादर है छोटी क्यों
या मेरे पांव लम्बे हो गये हैं


छांव की पहर है लम्बी क्यों
या धूप के साये लम्बे हो गये हैं


सच की उम्र है छोटी क्यों
या झूठ ज्यादा रसीले हो गये हैं


अमन की दस्तक है छोटी क्यों
या दगें हंसी फलसफे हो गये हैं


जिन्दगी की चाह हे छोटी क्यों
या बसंत के फूल शुष्क हो गये हैं


वर्षा में है प्यास क्यों
या घन प्यासे बरस रहे हैं।

[ कलाकार महेश द्वारा कविता पर उकेरी गई कलाकृति ]

जिन्दगी



जिन्दगी
गुलमोहर,पलाश अमलताश
हरसिंगार,अशोक के फूल
जिन्दगी
किसी शायर के नगमों की तरह
कितनी महकती मशगूल
बबूल,कैक्टस नागफनी,
सूखे वृक्ष,उडती धूल
जिन्दगी
किसी मजदूर की पसलियों की तरह
कितनी मजबूर।
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जिस कलम से यह कविता
लिखी गई है,वह मेरे पास नहीं है पर कविता
में रंग भरने के लिए कलाकार महेश द्वारा उकेरी गई रेखाएं
जिन्दगी को बेहद करीब से देखती हैं
निश्चित तौर पर लेखिका और कलाकार की यह बेहतरीन तुकबंदी है।

Wednesday, September 23, 2009

आडंबर


उत्सवों के बीच प्रेम,उल्लास,खुशी को खोजें




काफी सहज और साफगोई से अपनी बात रखने वाले मेरे अभिन्न मित्र महेश गुप्ता से मुलाकात हुए तो अरसा हो गया लेकिन जब भी मै उनकी कृतिया देखता हूं तो मुझे लगता है कि जल्द ही किसी मोड पर हम जरुर मिलेगें। विचार,संवेदना,अभिव्यक्ति से लबरेज महेश की कृतियों का प्रयोग करने का मौका मुझे असल में सात वर्षो के बाद मिला। सात वर्ष बाद ही सही मैं बेहद ही उत्साहित हूं कि मेरे नये ब्लाग की शुरूआत महेश की कृतियों से ही हो रही है।

Saturday, September 19, 2009

कला का सम्मान

आज दिल्ली में बड़े कलाकारों की जमघट रही

नयी खबर

कला की खबरें अब इस प्रकार हैं
Attention! This is not a healthy practice.